संभावनाओं के प्रतिमान

 

जीवन के अंतहीन संघर्ष में शायद आदमी हारकर भी जीत जाता है ।
बचपन से बुढ़ापे तक पढ़ता हैं अपने चारो और हो रहे परिवर्तन को
अंगीका

हमारी संस्कृति और सभ्यता पर

होली में

हमारी संस्कृति और सभ्यता पर 

किसने किया प्रहार 

होली में 

रंग की जगह खून 

प्रेम की जगह द्रेष 

अमृत की जगह विष 

और दैत्य जलने पर भी जिन्दा हैं 

कोई अर्जुन 

गीता का नहीं सुनता उपदेश 

दुश्मनो के हाथ वेच रहे हैं 

अपना देश 

हिंसा का तांडव देख 

अहिंसा छिपी बैठी हैं 

गांधी की धरती पर 

कौन सुनाएगा अब 

शांति सन्देश 

लोरियाँ सुनाकर 

सपूतों को जगाती हैं माँ 

हिमालय की उचाईयों से 

निरन्तर आवाज आती हैं   

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